Parasakthi कोई हल्की-फुल्की फिल्म नहीं है। यह ऐसी फिल्म है जो आराम से बैठकर देखने के लिए नहीं बनी, बल्कि सोचने के लिए मजबूर करती है। यह एक पीरियड तमिल ड्रामा है जो भाषा की पहचान, आत्मसम्मान और anti-Hindi imposition जैसे संवेदनशील मुद्दों को गंभीरता से उठाती है।
मुख्य भूमिका में Sivakarthikeyan हैं, जो इस बार पूरी तरह एक अलग और परिपक्व अवतार में नज़र आते हैं। यह फिल्म न तो सबको खुश करने की कोशिश करती है और न ही अपने विचारों से पीछे हटती है — और यही इसकी सबसे बड़ी ताक़त है।
कहानी और पृष्ठभूमि: जब भाषा बन जाती है पहचान
Parasakthi की कहानी एक ऐसे दौर में सेट है जहाँ भाषा सिर्फ़ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान और अस्तित्व का सवाल बन जाती है। फिल्म एक आम आदमी की यात्रा दिखाती है, जो धीरे-धीरे हालात के चलते विरोध की आवाज़ बनता है।
कहानी ज़ोर-ज़ोर से भाषण नहीं देती, बल्कि छोटे-छोटे दृश्यों के ज़रिये यह दिखाती है कि कैसे जबरन थोपी गई भाषा किसी समाज की जड़ों को हिला देती है। यहाँ संघर्ष शोर में नहीं, बल्कि खामोशी में दिखता है।
यह फिल्म अतीत की बात करते हुए वर्तमान से सीधा संवाद करती है।
Sivakarthikeyan का अभिनय: शांत लेकिन असरदार
Sivakarthikeyan का यह अब तक का सबसे संयमित और गंभीर अभिनय कहा जा सकता है। न कोई ज़रूरत से ज़्यादा हीरोइज़्म, न बनावटी डायलॉगबाज़ी।
उनकी ताक़त उनके हाव-भाव, आंखों की भाषा और चुप्पी में छुपी है। उनका किरदार धीरे-धीरे विकसित होता है — अचानक क्रांतिकारी नहीं बनता, बल्कि परिस्थितियाँ उसे उस रास्ते पर ले जाती हैं। यही बात इस अभिनय को असली बनाती है।
यह रोल साबित करता है कि Sivakarthikeyan सिर्फ़ एंटरटेनर नहीं, बल्कि वज़नदार विषयों को संभालने वाले अभिनेता हैं।
निर्देशन और पटकथा: संदेश है, उपदेश नहीं
फिल्म का निर्देशन संतुलित और आत्मविश्वास से भरा हुआ है। Parasakthi कहीं भी भाषणबाज़ी में नहीं फिसलती। पटकथा दर्शक पर भरोसा करती है कि वह खुद समझे, खुद महसूस करे।
विरोध, दमन और डर के दृश्य ज़मीन से जुड़े हुए लगते हैं। फिल्म की रफ्तार वहीं धीमी होती है जहाँ सोचने की ज़रूरत है, और वहीं तेज़ होती है जहाँ भावनाएँ उफान पर होती हैं।
यह संतुलन फिल्म को प्रभावी बनाता है।

तकनीकी पक्ष: सादगी में ताक़त
- सिनेमैटोग्राफी पीरियड के हिसाब से सधी हुई और वास्तविक
- बैकग्राउंड म्यूज़िक भावनाओं को उभारता है, लेकिन हावी नहीं होता
- प्रोडक्शन डिज़ाइन उस दौर का माहौल विश्वसनीय ढंग से पेश करता है
फिल्म तकनीकी तौर पर दिखावा नहीं करती, बल्कि कहानी की सेवा करती है।
आज के समय में Parasakthi क्यों ज़रूरी है
हालाँकि फिल्म अतीत में सेट है, लेकिन इसके सवाल आज भी उतने ही ज़िंदा हैं। भाषा, संस्कृति और पहचान को लेकर चल रही बहसों के बीच Parasakthi हमें याद दिलाती है कि समानता के नाम पर विविधता को कुचलना कितना ख़तरनाक हो सकता है।
यह फिल्म आपको बताती नहीं कि क्या सोचना है —
यह आपसे पूछती है कि आप किस कीमत पर चुप रहेंगे।
कमज़ोर पहलू
- कुछ सहायक किरदारों को और गहराई दी जा सकती थी
- कुछ भावनात्मक दृश्य और ज़्यादा असरदार हो सकते थे
लेकिन ये कमियाँ फिल्म के मकसद को कमज़ोर नहीं करतीं।
फाइनल वर्डिक्ट
Parasakthi एक साहसी, सोच-समझकर बनाई गई फिल्म है, जो अपने विचारों से समझौता नहीं करती। Sivakarthikeyan ने साबित कर दिया है कि वह गंभीर और राजनीतिक सिनेमा को भी पूरे आत्मविश्वास के साथ संभाल सकते हैं।
यह फिल्म भागने के लिए नहीं,
सामना करने के लिए बनी है।